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व्यास कृत भगवती स्तुति

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🔴व्यास कृत भगवती स्तुति🔴 जय भगवति देवि नमो वरदे, जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।। जय शुम्भनिशुम्भ कपालधरे, प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ।। १ ।। अर्थात्—हे वरदायिनी देवि ! हे भगवति ! तुम्हारी जय हो । हे पापों को नष्ट करने वाली और अनन्त फल देने वाली देवि ! तुन्हारी जय हो । हे शुम्भ-निशुम्भ के मुण्डों को धारण करने वाली देवि ! तुम्हारी जय हो । हे मनुष्यों की पीड़ा हरने वाली देवि ! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ । जय चन्द्रदिवाकर नेत्रधरे, जय पावकभूषित वक्त्रवरे । जय भैरवदेहनिलीन परे, जय अन्धकदैत्य विशोषकरे ।। २ ।। अर्थात्—हे सूर्य-चन्द्रमारूपी नेत्रों को धारण करने वाली देवि ! तुम्हारी जय हो । हे अग्नि के समान देदीप्यमान मुख से शोभित होने वाली ! तुम्हारी जय हो । हे भैरव-शरीर में लीन रहने वाली और अन्धकासुर का शोषण करने वाली देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो । जय महिषविमर्दिनि शूलकरे, जय लोकसमस्तक पापहरे । जय देवि पितामह विष्णुनते, जय भास्कर शक्र शिरोऽवनते ।। ३ ।। अर्थात्—हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, शूलधारिणी और लोक के समस्त पापों को दूर करने वाली भगवति ! तुम्हारी जय हो । ब्रह्मा, विष्णु, स...

श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्र

इसका पाठ सुबह शाम वो लोग जरूर करें जो विंध्य क्षेत्र में निवास करते हैं तथा जिनकी कुलदेवी माता विंध्यवासिनी हैं। श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्र निशुम्भ-शुम्भ-गर्जनीं, प्रचण्ड-मुण्ड-खण्डिनीम् । वने रणे प्रकाशिनीं भजामि विन्ध्यवासिनीम् ॥ त्रिशुल-मुण्ड-धारिणीं धरा-विघात-हारिणीम् । गृहे-गृहे निवासिनीं भजामि विन्ध्यवासिनीम् ॥ दरिद्रदुःख-हारिणीं, सदा विभुतिकारिणीम् । वियोग-शोक-हारिणीं,भजामि विन्ध्यवासिनीम् ॥ लसत्सुलोल-लोचनं लतासनं वरप्रदम् । कपाल-शुल-धारिणीं, भजामि विन्ध्यवासिनीम् ॥ कराब्जदानदाधरां, शिवाशिवां प्रदायिनीम् । वरा-वराननां शुभां भजामि विन्ध्यवासिनीम् ॥ ऋषिन्द्रजामिनीप्रदां, त्रिधा स्वरूप-धारिणीम् । जले स्थले निवासिनीं,भजामि विन्ध्यवासिनीम् ॥ विशिष्ट-शिष्ट-कारिणीं, विशाल रूप-धारिणीम् । महोदरे विलासिनीं, भजामि विन्ध्यवासिनीम् ॥ पुरन्दरादि-सेवितां पुरादिवंशखण्डिताम् । विशुद्ध-बुद्धिकारिणीं,भजामि विन्ध्यवासिनीम् ॥ इस स्तोत्र का पाठ बहुत सुंदर हैं, मन को अनुपम शांति मिलती है और ऐसा लगता है जैसे भगवती की कृपा हो गयी है।